अंतरिम बजट 2019- लोकसभा हार की डर से जनता को लुभाने की कोशिश, कहीं अच्छे दिन की तरह जुमला साबित न हो – सीटू

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अंतरिम बजट 2019 स भाजपा सरकार का कार्यकाल समाप्त होने से पहले लोगों को वोट देने के लिए धोखा देने का एक कपटपूर्ण प्रयास है, जबकि आगामी संसदीय चुनावों में हार का डर उसे सत्ता रहा है. अंतरिम बजट विभिन्न वर्गों के लोगों को तथाकथित राहत प्रदान करने की भ्रामक धारणा देने की कोशिश करता है. वास्तव में यह प्रो-कारपोरेट नवउदारवादी एजेंडे से थोड़ा भी अछूता नहीं है. जिसने पिछले कुछ महीनों में इन नीतियों का विरोध करने वाले मजदूरों, किसानों और गरीबों को इतना परेशान किया है जो सरकार को उनके मद्दों के बारे में बात करने के लिए मजबूर कर रहे हैं.

कार्यवाहक वित्त मंत्री ने कहा कि वह राजकोषीय घाटे के लक्ष्य तक नहीं पहुंच सके क्योंकि पैसा किसानों को देने का वादा किया गया था. अपने पांच साल के कार्यकाल की पूरी अवधि के दौरान मोदी की अगुवाई वाली भाजपा सरकार ने देश के लिए धन पैदा करने वाले श्रमिकों और किसानों को भुला दिया और अपने कारपोरेट गुरु, घरेलू और विदेशी लोगों की सेवा करने के लिए तथाकथित सुधारों को लागू करने में व्यस्त रही और ये लोग राष्ट्रीय संसाधनों को लूटते रहे. बजट में सार्वजनिक निवेश, रोजगार सृजन और लोगों की क्रय शक्ति में सुधारने को लागू के लिए कुछ भी नहीं किया है. बल्कि पीएसयू के विनिवेश को जारी रखने की अहंकारी घोषणा की है. जो हमारी आत्मनिर्भरता और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के विनाश का मार्ग प्रशस्त करने के उनके वास्तविक इरादे को दर्शाते है.

रोजगार के नाम पर पकौड़ा बेचने की दी गई सलाह
यह बजट बेरोजगारी के खतरनाक स्तर पर कुछ नहीं कहता है. यह पैंतालीस साल के उच्च स्तर पर पहुंच गया है और जिसे भाजपा सरकार ने अपने पक्ष में डेटा और विनिर्माण डेटा जारी नहीं करके दबाने की कोशिश की है. नौकरी चाहने वाले लोगों के लिए बायनबाजी को छोड़कर कोई ठोस प्रस्ताव नहीं है. किसी भी ठोस योजना की कमी कार्यवाहक वित्त मंत्री द्वारा यह घोषणा करने से स्पष्ट हो जाती है कि पे रोजगार सृजन केवल सरकारी सेवाओं या कारखानों तक ही सीमित नहीं है. संभवत यह युवाओं को पकौड़ा बेचने, पान की दुकानें लगानों या गायों को पालने के लिए भाजपा में अपने सहयोगियों की सलाह को दोहराना चाहते हैं.

किसानों का कर्ज माफ नहीं किया
अंतरिम बजट मे श्रमिकों की मजदूरी और किसानों की आय में सुधार करने के किए कुछ भी नहीं है. यह किसानों को कर्ज माफी की मांग को नजरअंदाज करता है. यह किसानों की उपज के लिए न तो उचित मूल्य सुनिश्चित करता है न ही सभी फसलों के लिए सुनिश्चित खरीद तंत्र, इसमें श्रमिकों के लिए न्यूनतम मजदूरी 1800 रुपए का उल्लेख नहीं है. मनरेगा का आवंटन वास्तव में पथले साल की तुलना में कम हो गया है. तब भी जब काम के दिनों की संख्या में भारी कमी आई है और श्रमिक कई महीनों तक अवैतनिक बने रहे हैं. मनरेगा के तहत किए गए काम के लिए अवैतनिक मजदूरी आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार 2017-18 में 5150 करोड़ रुपए को पार कर गई.

पेंशन धोखा देने का अभ्यास
असंगठित श्रमिकों के लिए 3000 रुपए को पेंशन किसी भी योजना के बिना मोदी सरकार का धोखा देने का घिसापीटा अभ्यास है. 500 करोड़ रुपए की राशि का आवंटन अपने आप में देश कमें 40 करोड़ से अधिक असंगठित श्रमिकों को कवर करने में गंभीरता ओर ईमानदारी की कमी का संकेत है. और ये केवल 60 वर्ष की आयु तक निरंतर योगदान करके इस पेंशन को प्राप्त करेंगे, जो कि उनमें से अधिकाँश नहीं कर सकते हैं. इस कार्यक्रम की घोषणा के पीछे असली कपटपूर्ण मंशा तब स्पष्ट हो जाती है जब गौ संरक्षण को 750 करोड़ रुपए का बड़ा आवंटन प्राप्त होता है.

भाजपा के पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है
आयकर भुगतान के लिए कमाई की छूट सीमा में वृद्धि लंबे समय से मांगी जा रही थी और इसके बारे में घमंड करने के लिए कुछ भी नहीं है. इसी तरह 2 हेक्टेयर से कम भूमि वाले किसानों के प्रति वर्ष 6 हजार रुपए का वादा किसानों के साथ एक क्रूर मजाक है. संभवत मंत्री चाहते है कि देश के लिए भोजन उपलब्ध कराने वाले किसान मूंगफली के साथ अपने भूखे पेट को संतुष्ट कर सके जो कि 15 रुपए प्रतिदिन की रियायती राशि खरीद सकते हैं. कृषि संकट को सार्थक तरीके से संबोधित करने का कोई इरादा नहीं है.

जैसा कि हाल ही में केंद्रीय मंत्रिमंडल में उनके एक सहयोगी ने खुलासा किया, इस बार भी भाजपा ने सरकार का नेतृत्व करते हुए स्पष्ट रूप से महसूस किया कि उनके पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है. क्योंकि वे सत्ता में आने वाले नहीं है. इस तरह के संदिग्ध अभ्यासों से लोगों को हमेशा के लिए धोखा नहीं दिया जा सकता है.

Source: 
lalluram.com

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