पत्थलगढ़ी आंदोलन के विरोध में युवा आदिवासी समाज, एसटी आयोग और पुलिस की भूमिका पर उठाए सवाल

पत्थलगढ़ी आंदोलन के विरोध में युवा आदिवासी समाज, एसटी आयोग और पुलिस की भूमिका पर उठाए सवाल

पत्थलगुड़ी के समर्थन में अब तक का सबसे बड़ा प्रदर्शन कांकेर ज़िले में 29 मई से शुरु हो रहा है. जिसकी जानकारी देते हुए छत्तीसगढ़ युवा आदिवासी समाज के संरक्षक योगेश कुमार ठाकुर ने कहा है कि पुलिस अब तक राजनैतिक अवसरवादिता से प्रेरित होकर ही अपने कर्त्तव्य से आंख चुरा रही है. हमारे द्वारा बार-बार यह ध्यान दिलाया गया था कि छग में पत्थलगड़ी की शुरुआत साल 2016 में कांकेर ज़िले से ही हुई थी. इस भड़काऊ आंदोलन के नए दौर की रहनुमाई करने वाले विचाराधीन बंदी विजय कुजुर के सम्मान में बड़ी रैलियां कांकेर ज़िले में की गई थीं.और कई शासकीय कर्मियों को धमकाने का काम युवा समूहों ने किया है.

योगेश ठाकुर ने कहा कि पत्थलगड़ी के खुल्लम खुल्ला अतार्किक-भड़काऊ समर्थन और विरोध के माध्यम से आदिवासी समाज के जिन लोगों ने भिन्न धार्मिक समुदायों के में वैमनस्य फ़ैलाने का अपराध किया था उसकी लिखित शिकायत मैंने 4 मई को पुलिस महानिदेशक को दर्ज़ कराई थी. सरकार ने सर्व सनातन आदिवासी समाज के पदाधिकारियों से तो पूछताछ की नहीं और दूसरी ओर छग सर्व आदिवासी समाज के पदाधिकारियों से मुख्य सचिव-गृह सचिव ने चाय पर ससम्मान चर्चा की है. स्थानीय स्तर पर काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्त्ताओं को तो उठाकर जेल में ठूंस दिया गया है और विधि-व्यवस्था को ठेंगा दिखाने वाले रायपुर-जशपुर नगर के संस्था पदाधिकारी झूमते चल रहे हैं. शासन को इस बात की कोई चिंता नहीं है कि आदिवासी एकता को जो ठेस पहुंची है उससे फ़ैली सामाजिक कटुता की कीमत ग्रामीणों को चुकानी पड़ रही है.

मुंह चुरा रहे हैं ये प्रमुख
योगेश कुमार ठाकुर ने विज्ञप्ति जारी करते हुए कहा कि राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग और राज्य अनुसूचित जनजाति आयोग दोनों ही संस्थानों के प्रमुख अपने विधिक कर्त्तव्य से साफ़ तौर पर मुंह चुरा रहे हैं. नंदकुमार साय और जी.आर. राणा का पत्थलगड़ी पर व्यवहार राजनैतिक कार्यकर्त्ता की तरह रहा है न कि संवैधानिक-जिम्मेदार पद पर आसीन अनुभवी पदाधिकारियों जैसा; जिसकी उनसे आशा थी. साय मुख्यमंत्री के विरोध के अपने एजेंडे के तहत खुद पत्थलगड़ी में शामिल हो गए और फ़िर राज्य सरकार के खिलाफ़ बयानबाजी का मोर्चा खोल दिया.

राणा ने राज्य सरकार की ओर से पत्थलगड़ी में की जा रही संविधान के प्रावधानों की अतार्किक व्याख्या को स्पष्ट करने के लिए अनौपचारिक पर्चे जारी किए. लेकिन दोनों ने ही अपनी शपथ और अपने वेतन के अनुरूप काम नहीं किया. इन दोनों संस्थानों का प्राथमिक कार्य अनुसूचित जनजाति के लिए प्रदत्त संवैधानिक रक्षोपायों के अनुपालन पर निगाह रखना और जांच कर के रिपोर्ट प्रस्तुत करना है.

पत्थलगड़ी पर जब इतनी आग फ़ैल रही थी तो दोनों संस्थानों को चाहिए था कि सभी संबद्ध व्यक्तियों व संस्थाओं को समन कर के बुलाया जाता और इस विषय पर अपना अपना पक्ष रखने को कहा जाता. इस जांच के बाद सम्यक ढंग से बनाई गई रिपोर्ट क्रमश: राष्ट्रपति और राज्यपाल को प्रस्तुत की जाती जिन्हें इनको संसद् और विधान मंडल के पटल पर रखना पड़ता और सार्थक चर्चा हो पाती.

आज तक तय नहीं हो पाई आदिवासी की परिभाषा
आदिवासी समाज के बुद्दिजीवियों का भी इस ओर ध्यान नहीं गया है कि पत्थलगड़ी द्वारा संविधान के प्रावधानों और उच्चतम न्यायालय के फ़ैसलों की अतार्किक व्याख्या का आदिवासी समाज के दीर्घकालिक हितों पर कितना प्रतिकूल असर पड़ रहा है. एक ओर गोंड़-हल्बा समाज और इसाई-गैर इसाई आदिवासियों में कटुता आई और दूसरी ओर लंबे समय से लटके संवैधानिक प्रश्नों का रजनैतिक हल खोजने की दिशा से भटकाने का भी काम हुआ. आज तक यह तय नहीं हो पाया है कि आदिवासी की परिभाषा क्या है, इसीलिए संविधान में इसकी जगह अनुसूचित जनजाति शब्द प्रयोग हुआ है.

इससे आदिवासी अधिकार संघर्ष की स्वतंत्र भाषा और व्याकरण का विकास ही नहीं हो सका और उसे दलित संघर्ष से उधार लेकर चलना पड़ रहा है. ठाकुर ने आगे कहा कि अनुसूचित जनजाति ही भारत के मूलवासी हैं इस दावे के लिए बीस सालों में भी भारत शासन पर दबाव नहीं बनाया जा सका जिससे संयुक्त राष्ट्र संघ की मूलजन अधिकारों की वैश्विक घोषणा 2007 भारत में लागू नहीं हो पाई. कई आदिवासी नेता स्वयं दलित और अन्य पिछड़ा वर्ग के मूलजन होने के दावे का समर्थन कर के आदिवासी समाज का अहित कर रहे हैं.

यातना झेल रहे हैं आदिवासी
संविधान की सामान्य अभिशासन व्यवस्था से अलग एक व्यवस्था पांचवीं अनुसूची के रूप में देने की ज़रूरत क्यों पड़ी और इसका सार्थक क्रियान्वयन कैसे होना है, यह सवाल कभी भी उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ के सामने लाया ही नहीं जा सका. पांचवीं अनुसूची में राज्यपाल के अधिकार विवेकाधिकार हैं या नहीं, इस पर राष्ट्रपति द्वारा उच्चतम न्यायालय से अनुच्छेद 143 के तहत विधिक राय मांगने का दबाव नहीं बनाया जा सका. अधिकतर व्यक्ति और संगठन अपना राजनैतिक/चुनावी गणित साधने में लगे हैं जबकि आरक्षण की बहस से दूर जंगल-पहाड़ में रहने वाले आदिवासी विस्थापन, हिंसा और वन्य-संसाधनों की वंचना झेल रहे हैं. नकली लड़ाई का विरोध इसलिए ज़रूरी है कि आदिवासी अधिकार के असली मुद्दों पर सार्थक चर्चा कराई जा सके.

Source: 
lalluram.com

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