यहां रावण को पूजते हैं आदिवासी, किया रावण दहन का विरोध

यहां रावण को पूजते हैं आदिवासी, किया रावण दहन का विरोध

एक तरफ जहां पूरे देश में विजयादशमी के दिन रावण दहन किए जाने की परंपरा है, वहीं छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले के मूल निवासी आदिवासी समाज ने इस परंपरा का विरोध जताया है। इस संबंध में अनुविभागीय अधिकारी राजस्व देवभोग को आदिवासियों ने मांग पत्र भी सौंपा है।
सौंपे गए पत्र में मांग की गई है कि मूल निवासी आदिवासी समाज में महाराज राजा रावण को पेन शक्ति के रूप में आदिकाल से पूजा जा रहा है। इसलिए आदिवासी समाज की ओर से दशहरा पर रावण दहन का विरोध किया जा रहा है। साथ ही मांग की गई है कि रावण दहन करने पर दंड संहिता 1860 अंर्तगत 153 (अ) और 295 ( अ) के तहत अपराधिक मामला दर्ज किया जाए। पांचवीं अनुसूची क्षेत्र में रुढि़ प्रथा का पालन किया जाए।
इस संबंध में विस्तृत चर्चा करते हुये आदिवासी विकास परिषद के संरक्षक तथा सर्व आदिवासी समाज जिला गरियाबंद के उपाध्यक्ष महेन्द्र नेताम ने बताया कि दुर्गा नवमी के दिन हम सभी आदिवासी समाज के लोग महिषासुर और रावण की परंपरानुसार अपने घरों व खेतों में पूजा करते हैं । नवमी के दिन हमारी सभी आदिवासी बहनें निर्जला उपवास रखते हुए, शाम के वक्त अपने घर भाइयों को बुलाकर पूजा करती हैं और ये कामना करती है कि उन्हें रावण के जैसा भाई मिले, जिसने बहन की खातिर अपने राजपाट की भी चिंता नहीं की थी। महेन्द्र नेताम के अनुसार दशहरा पर रामलीला - नाटक आदि पर हमें कोई आपत्ति नहीं है पर रावण के पुतले का दहन हमारी भावनाओं के साथ खिलवाड़ है। नेताम ने ये भी बताया की मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखण्ड ओडि़शा जैसे आदिवासी बहुल राज्यों के सभी आदिवासी रावण दहन का विरोध करते हैं। नेताम का कहना है कि आदिवासी युवाओं के अनुसार जिसे हम प्राचीन काल से परंपरागत रूप से पूजते आ रहे हैं उस आदि पुरुष के पुतले बनाकर सार्वजनिक रुप से दहन करने पर आदिवासियों की भावना को ठेस पहुंचती है, इसीलिए रावण दहन बंद किया जाना चाहिए।

Source: 
visionnewsservice.in

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