साहित्यकार पं. श्यामलाल चतुर्वेदी का निधन, सीएम रमन बोले- पत्रकारिता के एक सुनहरे युग का अंत हो गया

साहित्यकार पं. श्यामलाल चतुर्वेदी का निधन, सीएम रमन बोले- पत्रकारिता के एक सुनहरे युग का अंत हो गया

प्रदेश के साहित्यकार और वरिष्ठ पत्रकार पं. श्यामलाल चतुर्वेदी का शुक्रवार को हो गया. मुख्यमंत्री डॉ .रमन सिंह ने श्री चतुर्वेदी के निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया है. पद्मश्री सम्मानित पण्डित श्यामलाल श्यामलाल चतुर्वेदी छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के प्रथम अध्यक्ष थे. उनका निधन आज सवेरे अपने गृहनगर बिलासपुर के एक प्राइवेट अस्पताल में हुआ.

मुख्यमंत्री डॉ. सिंह ने रायपुर में जारी शोक संदेश में कहा कि पण्डित श्यामलाल चतुर्वेदी के निधन से छत्त में साहित्य और पत्रकारिता के एक सुनहरे युग का अंत हो गया. मुख्यमंत्री ने उनके शोक संतप्त परिवार के प्रति अपनी संवेदना प्रकट की है और दिवंगत आत्मा की शान्ति के लिए ईश्वर से प्रार्थना की है. ज्ञातव्य है कि पण्डित श्यामलाल चतुर्वेदी को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने इस वर्ष 3 अप्रेल को राष्ट्रपति भवन नईदिल्ली में आयोजित समारोह में पद्मश्री अलंकरण से सम्मानित किया था.

पंडित श्यामलाल चतुर्वेदी छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के पहले चेयरमैन थे. उनकी उम्र 93 साल की थी. श्यामलाल चतुर्वेदी का जन्म 1926 में छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले के कोटमी गांव में हुआ था. बिलासपुर के श्यामलाल चतुर्वेदी को साहित्य, शिक्षा व पत्रकारिता में उल्लेखनीय योगदान के लिए पद्मश्री सम्मान दिया गया था. बताते हैं कि अपने वक़्त में वे रायपुर-बिलासपुर करीब 114 किलोमीटर साइकिल से आना-जना करते थे. ये उनकी सादगी थी. वे छत्तीसगढ़ में कुछ प्रमुख अखबारों के प्रतिनिधि भी रहे हैं.

पंडित श्यामलाल चतुर्वेदी की कहानी संग्रह ‘भोलवा भोलाराम’ को काफी सराहना मिली. वे छत्तीसगढ़ी के गीतकार भी रहे. उनकी रचनाओं में ‘बेटी के बिदा’ प्रसिद्ध रचना है. उन्हें ‘बेटी के बिदा’ के कवि के रुप में लोग पहचानते हैं. बताया जाता है बचपन में मां के कारण उनका रुझान लेखन में हुआ. उनकी मां ने उन्हें सुन्दरलाल शर्मा की ‘दानलीला’ रटा दी थी.

75 वर्षों तक साहित्य साधना में जुटे रहे चतुर्वेदी
श्यामलाल चतुर्वेदी करीब 75 वर्षों तक साहित्य साधना के जरिए हिन्दी और छत्तीसगढ़ी साहित्य को समृद्ध बनाने की कोशिश करते रहे. उन्होंने पत्रकारिता और शिक्षा के क्षेत्र में भी अपनी मूल्यवान सेवाएं दी हैं. वे मूलरूप से तत्कालीन अविभाजित बिलासपुर जिले के ग्राम कोटमी सोनार (वर्तमान में जिला जांजगीर-चांपा) के निवासी है, लेकिन साहित्यकार और पत्रकार के रूप में बिलासपुर उनकी कर्मभूमि रही.

Source: 
lalluram.com

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